बॉलीवुड डेस्क. आयुष्मान खुराना अंधाधुन के बाद फिर से एक शानदार फिल्म बधाई हो में काम कर रहे हैं। इस फिल्म को अमित रविन्द्रनाथ शर्मा ने डायरेक्ट किया है। जब अधेड़ उम्र के पैरेंट्स फिर से पैरेंट्स बनने वाले हो तो क्या होता है यही फिल्म में दिखाया गया है। बच्चे ऐसा सोचते हैं कि पैरेंट्स उम्र के साथ सेक्स करना बंद कर देते हैं, उनके लिए यह फिल्म वेक अप कॉल की तरह है।
डायरेक्टर विपुल अमृतलाल शाह ने 2007 में नमस्ते लंदन बनाई थी जिसमें अक्षय कुमार और कैटरीना कैफ थे। नमस्ते लंदन में अक्षय कुमार के कैरेक्टर की तरह ही फिल्म का मुख्य किरदार परम (अर्जुन कपूर) भी देशभक्त है।
4 प्वाइंट में समझें कैसी है फिल्म
परम किसान है जिस पर उसके पिता को गर्व है। वह पड़ोस में रहने वाली लड़की जसमीत के प्यार में पड़ जाता है। पहली बार उसे दशहरा पर देखता है। बाद में सभी त्योहारों पर उसकी नजर जसमीत पर ही रहती है।
होली के समय से वो परम को रिस्पॉन्स देना शुरू करती है। परम का एक दोस्त जसमीत की सहेली से शादी करता है जिसके जरिए परम को उसके साथ समय बिताने का मौका मिलता है। जैसा कि होता है जसमीत को भी परम से प्यार हो जाता है।
दोनों की लव स्टोरी शुरू हो जाती है लेकिन, तभी स्टोरी में ट्विस्ट आता है जसमीत का सपना ज्वलैरी डिजाइनर बनने का है जिसके लिए उसे अपने पिता के घर से दूर जाना होगा। वह ऐसा फैसला करती है जिससे परम का दिल टूट जाता है। जसमीत लंदन चली जाती है और परम किसी भी कीमत पर उसके पीछे जाने का फैसला लेता है।
अपनी फिल्म पर गर्व होना अच्छी बात है लेकिन अपनी ही फिल्म को कॉपी करके दूसरी बुरी फिल्म बनाना। कुछ ऐसा ही हुआ है नमस्ते इंग्लैंड के साथ। शाह की नमस्ते लंदन उस वक्त के हिसाब से उपयुक्त थी। नई कहानी के साथ अच्छे कलाकार थे। लेकिन नमस्ते इंग्लैंड पहली फिल्म की गरीब बहन लगती है। इस स्टोरी को समकालीन बनाने के लिए प्रयास किए गए हैं लेकिन वे उचित नहीं हैं।
कहानी पुरानी है भले ही इसे नया दिखाने की कोशिश की गई है। फिल्म में जसमीत का पति परम उसके सपनों को पूरा करने में उसका पूरा सपोर्ट करता है लेकिन वो अपने आप को इस बात का दोषी मान रही है कि उसका ध्यान पति से ज्यादा अपनी महत्वाकांक्षा पर है। अक्षय कुमार की देशभक्ति वाली छवि को इस फिल्म में दोबारा क्रिएट करने की कोशिश की गई है लेकिन यहां वैसे जुनून और गहराई की कमी है।
अर्जुन कूपर का काम अच्छा है। फिल्म में उनका चार्म दिखता है लेकिन अधकचरा किरदार उनके अभिनय के साथ न्याय नहीं करता। परम का जसमीत के लिए प्यार सच्चा दिखता है लेकिन, उसको वापस लाने के लिए वो जो करता है उसमें कोई लॉजिक नहीं दिखाई देता।
परिणीति का अभिनय एकदम सपाट है। जिसे देखकर लगता है कि वे जो कर रही है उसको लेकर खुद ही कंविंस नहीं है। अलंकिृता सहाय का काम अच्छा है। आदित्य सील के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। सील और परिणीति के बीच कैमेस्ट्री का अभाव दिखाई देता है जो कि परिणीति के प्यार में पड़ गया है।
फिल्म के खराब एक्जीक्यूशन, कमजोर स्क्रिप्ट की वजह से न तो ये मनोरंजन करती है और ना ही प्रेरित। जहां नमस्ते लंदन में कर्णप्रिय संगीत था वहीं इसमें वो भी नहीं है। अगर आप सच में विपुल शाह की कोई फिल्म देखना चाहते हैं तो नमस्ते लंदन को एक बार फिर से देख लीजिए।
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